तंत्र सूत्र—विधि -73 (ओशो)

‘ग्रीष्‍म ऋतु में जब तुम समस्‍त आकाश को अंतहीन निर्मलता में देखो, उस निर्मलता में प्रवेश करो।‘’ मन विभ्रम है; मन उलझन है। उसमें स्‍पष्‍टता नहीं है। निर्मलता नहीं है। और मन सदा बादलों से घिरा रहता है। वह कभी निरभ्र, शुन्‍य आकाश नहीं होता। मन निर्मल हो ही नहीं सकता। तुम अपने मन को … Read more तंत्र सूत्र—विधि -73 (ओशो)