संभोग से समाधि की ओर—05 (ओशो)

संभोग: अहं-शून्‍यता की झलक—1 मेरे प्रिय आत्‍मन, एक सुबह, अभी सूरज भी निकलन हीं था। और एक मांझी नदी के किनारे पहुंच गया था। उसका पैर किसी चीज से टकरा गया। झुककर उसने देखा। पत्‍थरों से भरा हुआ एक झोला पडा था। उसने अपना जाल किनारे पर रख दिया,वह सुबह के सूरज के उगने की … Read more संभोग से समाधि की ओर—05 (ओशो)