संभोग से समाधि की ओर—27 (ओशो)

प्रेम ओर विवाह– मनुष्‍य की आत्‍मा, मनुष्‍य के प्राण निरंतर ही परमात्‍मा को पाने के लिए आतुर है। लेकिन किस मनुष्‍य को? कैसे परमात्‍मा को? उसका कोई अनुभव, उसका कोई आकार, उसकी कोई दिशा मनुष्‍य को ज्ञात नहीं है। सिर्फ एक छोटा सा अनुभव है, जो मनुष्‍य को ज्ञात है। और जो परमात्‍मा की झलक … Read more संभोग से समाधि की ओर—27 (ओशो)