संभोग से समाधि की ओर—34 (ओशो)

जनसंख्‍या विस्‍फोट कुछ प्रश्‍न उठाये जाते है। यहां उनके उत्‍तर देना पसंद करूंगा:– एक मित्र ने पूछा है कि अगर यह बात समझायी जाये तो जो समझदार है, बुद्धिजीवी है, इंटेलिजेन्‍सिया है, मुल्‍क का जो अभिजात वर्ग है, बुद्धिमान और समझदार है, वह तो संतति नियमन कर लेगा, परिवार नियोजन कर लेगा। लेकिन जो गरीब … Read more संभोग से समाधि की ओर—34 (ओशो)

संभोग से समाधि की ओर—33 (ओशो)

जनसंख्‍या विस्‍फोट जीने का क्‍या अर्थ? जीने का इतना ही अर्थ है कि ‘ईग्जस्ट’ करते है। हम दो रोटी खा लेते है, पानी पी लेते है। और कल तक के लिए जी लेते है। लेकिन जीना ठीक अर्थों में तभी उपलब्‍ध होता है जब हम ‘एफ्ल्‍युसन्‍स’ को, समृद्धि को उपलब्‍ध हो। जीवन का अर्थ है … Read more संभोग से समाधि की ओर—33 (ओशो)

संभोग से समाधि की ओर—32 (ओशो)

जनसंख्‍या विस्‍फोट और बहुत से अनजाने मानसिक दबाब भी है। गुरुत्वाकर्षण तो भौतिक दबाव हे; लेकिन चारों तरफ से लोगों की मोजूदगी भी हमको दबा रही है। वे भी हमें भीतर की तरफ प्रेस कर रहे है। सिर्फ उनकी मौजूदगी भी हमें परेशान किये हुए है। अगर यह भीड़ बढ़ती चली जाती है। तो एक … Read more संभोग से समाधि की ओर—32 (ओशो)

संभोग से समाधि की ओर—31 (ओशो)

जनसंख्‍या का विस्‍फोट- पृथ्‍वी के नीचे दबे हुए, पहाड़ों की कंदराओं में छिपे हुए, समुद्र की सतह में खोजें गये बहुत से ऐसे पशुओ के अस्‍थिर पंजर मिले है, जिनका अब कोई नामों निशान नहीं रह गया है। वे कभी थे। आज से दस लाख साल पहले पृथ्‍वी बहुत से सरीसृप प्राणियों से भरी थी। … Read more संभोग से समाधि की ओर—31 (ओशो)

संभोग से समाधि की ओर—30 (ओशो)

प्रेम ओर विवाह– अगर मनुष्‍य जाति को परमात्‍मा के निकट लाना है, तो पहला काम परमात्‍मा की बात मत करिये। मनुष्‍य जाति को प्रेम के निकट ले आइये। जीवन जोखिम भरा है। न मालूम कितने खतरे हो सकते है। जीवन की बनी-बनाई व्‍यवस्‍था में न मालूम कितने परिवर्तन करने पड़ सकते है। लेकिन न पर … Read more संभोग से समाधि की ओर—30 (ओशो)

संभोग से समाधि की ओर—29 (ओशो)

प्रेम ओर विवाह– मेरी दृष्‍टि में जब तक एक स्‍त्री और पुरूष परिपूर्ण प्रेम के आधार पर मिलते हे, उनका संभोग होता है। उनका मिलन होता है तो उस परिपूर्ण प्रेम के तल पर उनके शरीर ही नहीं मिलते है। उनकी आत्‍मा भी मिलती है। वे एक लयपूर्ण संगीत में डूब जाते है। वे दोनों … Read more संभोग से समाधि की ओर—29 (ओशो)